सागर जितना सिलेबस है,
नदी भर पढ़ पाते हैं,
बाल्टी जितना याद रहता है,
लोटा भर लिख पाते हैं,
चुल्लू में नंबर आते हैं,
उसमें डूब हम जाते हैं।
इस कविता में प्रसाद या बच्चन वाला लालित्य नहीं है पर बात सौ फीसदी सही है। दशकों से हमारी पढ़ाई का एक ही ढर्रा है, लंबा-चौड़ा सिलेबस, दर्जनों किताबें, उबाऊ कक्षाएं और साल के अंत में ब्लड प्रेशर बढ़ाने वाली परीक्षाएं। बच्चों के सामने सीखने से बड़ी चुनौती पास होने की होती है। व्यवहारिक और प्रायोगिक तरीकों से अंजान हमारी शिक्षा पद्घति में उसे अच्छे नंबर लाने का एक ही तरीका दिखता है, रटना। कमोबेश ज्यादातर स्कूलों का माहौल भी ऐसा है, जहां बच्चों को रटने के लिए प्रेरित किया जाता है – कौन कितने सूत्र रट सकता है, किसे अधिक प्रमेय याद हैं, कौन बच्चा कितनी तरह की परिभाषाएं लिख सकता हैं। नतीजे में बनती है एक बोझिल प्रक्रिया, जिसमें बच्चा उलझ कर रह जाता है। अमर उजाला फाउंडेशन का प्रयास है कि विद्यार्थियों को काम की बातें खेल-खेल में ही सिखाई जाएं। इससे वे मनोरंजन के साथ ज्ञान भी बटोर सकेंगे। इसका पहला प्रयोग हुआ कानपुर में। कानपुर के विभिन्न स्कूलों में 14 जुलाई से सात अगस्त 2011 तक विज्ञान कार्यशालाएं आयोजित की गईं। इसमें बच्चों ने विज्ञान के मॉडलों से कई तरह के प्रयोग सीखे और बाद में उन प्रयोगों को करके भी दिखाया। अगली कड़ी में आठ अगस्त से 12 अगस्त 2011 तक उरई के विद्यालयों में कार्यशालाएं हुईं। अपेक्षा से अ‌धिक उरई जैसे छोटे शहर में भी हजारों विद्यार्थियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
-मोबाइल वैन के माध्यम से विज्ञान के 150 से अधिक प्रयोग दिखाए गए।
-44 विज्ञान कार्यशालाएं हुईं, जिनमें 80 स्कूलों ने हिस्सा लिया।
-10 हजार से अधिक बच्चों ने विज्ञान के गुर सीखे।
-भौतिक और रसायन विज्ञान के प्रयोगों के अलावा बच्चों ने जीव ‌विज्ञान के प्रयोग भी करके दिखाए।
-विज्ञान मेले में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों और प्रश्‍नोत्तरी प्रतियोगिता के विजेताओं को सम्मानित किया गया।
सहयोग : अगस्‍त्या फाउंडेशन

हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती – यह कहना जितना सरल है, इसपर अमल करना उतना ही मुश्किल। डगमगाए आत्मविश्‍वास का नतीजा यह होता है कि हम छोटी सी चुनौती के सामने ही ढेर हो जाते हैं। वैसे खुद पर भरोसा कायम करना इतना भी मुश्किल नहीं है। अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास के लिए कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं। इनमें यह भी सिखाया जाता है कि कैसे हिम्‍म्त और आत्मविश्‍वास के बल पर बड़ी से बड़ी मुश्किल हल की जा सकती है। इसी क्रम में गाजियाबाद के राजकीय कन्या इंटर कॉलेज, विजयनगर में 18 सितंबर, 2014 से आठ दिवसीय पर्सनालिटी डेवलेपमेंट कार्यशाला लगाई गई। छात्राओं को बताया गया कि खुद को संवारने की पहली सीढ़ी संवाद है। संवाद स्‍थापित करने की कला जितनी बेहतर होगी, व्यक्ति सामने वाले पर उतना बेहतर प्रभाव डाल पाएगा।
-कार्यशाला में सीनियर एचआर राम राकेश ने बताया कि प्रभावशाली व्यक्तित्व का अहम हिस्सा चेहरे द्वारा प्रस्तुत की गई भाव-भंगिमा होती है। उन्होंने उदाहरण देकर समझाया कि बातचीत में शब्दों के चयन और बॉडी लैंग्वेज से कोई किस तरह अपना प्रभाव दूसरों पर छोड़ सकता है। छात्राओं ने यह भी जाना कि किस तरह एक ही बात को अलग-अलग टोन में कहने से उसके अर्थ बदल जाता है।
-करियर काउंसलर रतन प्रभा ने छात्राओं से उनके व्यक्तिगत जीवन से जुड़ी समस्याओं को जानने का प्रयास किया।
-छात्राओं ने खेलों के माध्यम से समूह की शक्ति को जाना।
-व्यक्तित्व विकास कार्यशाला के अंतिम दिन मशहूर वैज्ञानिक प्रो. यशपाल और छात्राओं के बीच सीधा संवाद हुआ। प्रो. यशपाल ने मंगल ग्रह और मार्स ऑर्बिटर मिशन (मंगलयान) की सफलता और उससे जुड़ी छात्राओं की जिज्ञासाओं का समाधान किया।

टूटी चप्पलों का विज्ञान – कई बच्चों के लिए विज्ञान की पढ़ाई बहुत ही बोझिल होती है। प्रकाश, घर्षण, गति, द्रव्यमान केंद्र … इतनी सारी चीजें होती हैं याद करने के लिए कि दिमाग चकरा जाता है। बच्चों को समझ में नहीं आता कि इनके नियमों को समझा कैसे जाए और उससे बढ़कर याद कैसे रखा जाए। फाउंडेशन ने अपने विज्ञान मेले में इसका हल निकालने की कोशिश की है। इस अभियान के तहत 27 और 28 नवंबर 2014 को झज्जर के सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल में दो दिवसीय विज्ञान मेला लगाया गया। मेले के पहले दिन बच्चों को विज्ञान के मॉडल बनाना सिखाया गया। बच्चों ने जाना कि रबर की टूटी हुई चप्पल, कीलें, चुंबक, लोहे के बेकार तार, गुब्बारे और प्लास्टिक की बोतल से भी विज्ञान समझा जा सकता है। छोटे और सरल माडलों द्वारा बच्चों को बेसिक साइंस के बारे में विस्तार से बताया गया। दूसरे दिन इन बच्चों ने सिखाए गए माडलों की स्टाल लगाई और दूसरे बच्चों को इनके बारे में बताया यानी बच्चों ने बच्चों को सिखाया।
-पहले दिन प्रशिक्षण में विद्यालय के 60 विद्यार्थियों ने भाग लिया।
-भौतिक और रसायन विज्ञान के प्रयोगों के अलावा बच्चों ने जीव ‌विज्ञान के प्रयोग भी करके दिखाए।
-मेले के दूसरे दिन प्रदर्शनी देखने के लिए राजकीय कन्या विद्यालय, होली एंजल्स स्कूल बेरी समेत कई अन्य विद्यालयों के बच्चे आए थे।
-विज्ञान मेले में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को झज्जर के जिला उपायुक्त अंशज सिंह ने सम्मानित किया।

आसान हो गई गणित की गणना – अगर आपको 8546285254654 का गुणा 9999999999999 से करना हो तो शायद बिना कैलकुलेटर इसका उत्तर न निकाल पाएं या फिर पेन कॉपी लेकर थोड़ी देर जरूर जूझते रहेंगे लेकिन वैदिक गणित के जरिए ऐसी गणनाएं चुटकियों या कहें कुछ सेकेंडों में की जा सकती है। वैदिक गणित के इन्हीं गुणों को विद्यार्थियों को समझाने के लिए फाउंडेशन ने सितंबर में कानपुर में अभियान चलाया। इसके तहत 15 स्कूलों में कार्यशालाएं हुईं। गणित के साथ अंग्रेजी पढ़ने के टिप्स भी दिए गए। हर स्कूल में दो तरह की कार्यशाला हुईं। इसमें कक्षा छह से आठ तक के बच्चों को गणित के टिप्स और कक्षा नौ से 12 तक के बच्चों को अंग्रेजी के टिप्स दिए गए।
-अंग्रेजी के टेंस को संस्कृत के सबसे प्राचीन व्याकरण पाणिनी की अष्टाध्यायी के सूत्र के आधार पर समझाया गया।
-शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास से जुड़े एक्सपर्ट यशभान सिंह तोमर ने व्याकरण से जुड़ी कई दिक्कतों का समाधान किया।
-महाराणा प्रताप इंजीनियरिंग कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर सुजीत सिंह ने बच्चों को वर्ग आधारित प्रश्न समझाए। बड़े से बड़े संख्या के वर्ग को मिनटों में हल करने का फार्मूला मिलने पर बच्चे बेहद खुश नजर आए।
सहयोग : शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास समिति